सुनील बौद्ध (सुनील कुमार)
संघर्ष, स्वावलंबन, शिक्षा और सामाजिक चेतना से निर्मित एक जीवन यात्रा
कुछ जीवन सुविधाओं के बीच आकार लेते हैं, जबकि कुछ जीवन संघर्षों की आग में तपकर अपना स्वरूप स्वयं गढ़ते हैं। सुनील बौद्ध, जिन्हें सुनील कुमार के नाम से भी जाना जाता है, का जीवन दूसरी श्रेणी का जीवन है—एक ऐसा सफर जिसकी शुरुआत एक साधारण परिवार से हुई, जिसने आर्थिक कठिनाइयों, पारिवारिक जिम्मेदारियों, असफलताओं, रोजगार के उतार-चढ़ाव और सामाजिक परिस्थितियों का सामना किया, लेकिन जिसने हर मोड़ को सीखने और आगे बढ़ने का माध्यम बनाया।
आज उनका परिचय केवल एक व्यवसायी या सामाजिक कार्यकर्ता तक सीमित नहीं है। शिक्षा, स्वरोजगार, सामाजिक संगठन, बौद्ध धम्म, अनुसूचित जाति–जनजाति एवं पिछड़े समुदायों के कल्याण तथा सामाजिक अधिकारों से जुड़े कार्यों में उनकी लगभग डेढ़ दशक की सक्रिय यात्रा उनके व्यक्तित्व के अनेक आयामों को सामने लाती है।
पारिवारिक विरासत और संघर्ष की जड़ें
सुनील कुमार की जीवन कहानी को समझने के लिए उनके पिता श्री दरियाव सिंह के संघर्ष को जानना आवश्यक है।
उनके पिता का जन्म लगभग 1940–42 के आसपास हरियाणा के बजाना गाँव में एक अनुसूचित जाति परिवार में हुआ था। उनके दादा श्री बनवारी लाल पारंपरिक रूप से जूती बनाने के कुशल कारीगर थे। उसी मेहनत से परिवार का पालन-पोषण होता था।
उस दौर में परिवार के पास खेती-बाड़ी के लिए अपनी जमीन नहीं थी। रहने के लिए भी लकड़ी और मिट्टी से बना एक साधारण-सा छोटा घर था। आर्थिक साधन अत्यंत सीमित थे, लेकिन इन परिस्थितियों के बावजूद परिवार ने शिक्षा का महत्व समझा।
दरियाव सिंह ने बजाना गाँव के सरकारी विद्यालय में पढ़ाई की और दसवीं कक्षा उत्तीर्ण की। उस समय दसवीं तक शिक्षा प्राप्त करना गाँव के गरीब और वंचित परिवार के किसी युवक के लिए एक बड़ी उपलब्धि थी। परिवार की स्मृतियों के अनुसार, उस दौर में वे गाँव के बहुत कम शिक्षित लोगों में से एक थे।
कम उम्र में ही उनका विवाह हो गया। परिवार बढ़ने के साथ जिम्मेदारियाँ और खर्च भी बढ़ने लगे। परिस्थितियों के कारण उन्हें आगे की पढ़ाई छोड़नी पड़ी और उन्होंने अपने पिता से सीखी जूती बनाने की कला को जीविका का साधन बनाया।
लेकिन जीवन ने उनके लिए कुछ और तय कर रखा था।
उनके गाँव का ही एक परिचित व्यक्ति दिल्ली में सरकारी नौकरी प्राप्त कर बस चुका था। छुट्टियों के दौरान गाँव आने पर उसने दरियाव सिंह की शिक्षा और क्षमता को देखते हुए उनसे कहा कि दसवीं पास होने के कारण उन्हें दिल्ली में नौकरी के अवसर तलाशने चाहिए।
यही सलाह उनके जीवन का निर्णायक मोड़ बनी।
लगभग 1960 के आसपास श्री दरियाव सिंह दिल्ली आए। शुरुआत आसान नहीं थी। दिल्ली में अलग-अलग स्थानों पर रहना पड़ा, अनेक छोटे-बड़े काम करने पड़े और लंबे संघर्ष के बाद उन्हें दिल्ली सरकार के लोक नायक जयप्रकाश नारायण अस्पताल (LNJP Hospital) के मेडिकल विभाग में चतुर्थ श्रेणी की सरकारी नौकरी मिली।
जिस व्यक्ति की जिंदगी कभी एक छोटे मिट्टी-लकड़ी के घर और जूती बनाने के काम से शुरू हुई थी, उसी व्यक्ति ने संघर्ष के बल पर दिल्ली में अपने पूरे परिवार के लिए एक नई नींव खड़ी की।
समय के साथ उनके भाई-बहन और परिवार के कई सदस्य भी दिल्ली आकर उनके साथ रहने लगे।
श्री दरियाव सिंह और उनकी पत्नी श्रीमती धनपति देवी के परिवार में सबसे पहले बेटी वर्षा, उसके बाद पुत्र सुशील, फिर बेटी नीतू और अंत में वर्ष 1984 में सुनील कुमार का जन्म हुआ।
जन्म और बचपन
सुनील कुमार का जन्म वर्ष 1984 में उत्तर दिल्ली के धीरपुर गाँव, दिल्ली–110009 में एक साधारण एवं आर्थिक रूप से सीमित परिवार में हुआ।
उनके जन्म से कुछ समय पहले परिवार के आसपास हुई एक गंभीर लड़ाई-झगड़े की घटना का उनकी माता धनपति देवी के मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव पड़ा। इसके कारण बचपन में सुनील को माँ के सामान्य स्नेह और स्तनपान का वह अनुभव नहीं मिल पाया जो अधिकांश बच्चों को मिलता है।
उनका पालन-पोषण कठिन परिस्थितियों के बीच हुआ। बाजार से मिलने वाले दूध और परिवार के सीमित संसाधनों के सहारे उन्होंने अपने बचपन के शुरुआती वर्ष बिताए।
जिस धीरपुर गाँव के छोटे से घर में उनका जन्म हुआ, वहीं उनका बचपन, युवावस्था और जीवन का अधिकांश हिस्सा बीता और वर्तमान समय तक उनका संबंध उसी स्थान से बना हुआ है।
यह घर उनके लिए केवल निवास स्थान नहीं, बल्कि परिवार के संघर्ष, पिता की मेहनत और स्वयं उनके जीवन की अनेक स्मृतियों का साक्षी है।
शिक्षा की शुरुआत
सुनील कुमार ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा दिल्ली से प्राप्त की।
उन्होंने लगभग 1989 से 1994 तक नर्सरी से पाँचवीं कक्षा तक की पढ़ाई MCD प्राथमिक विद्यालय, मुखर्जी नगर, दिल्ली से पूरी की।
इसके बाद उन्होंने छठी कक्षा से बारहवीं तक की शिक्षा संत निरंकारी बॉयज सीनियर सेकेंडरी स्कूल, निरंकारी कॉलोनी, दिल्ली से प्राप्त की और लगभग 2002 तक अपनी स्कूली शिक्षा पूरी की।
परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि पढ़ाई पूरी करने के बाद वे बिना कमाई किए लंबे समय तक केवल उच्च शिक्षा पर ध्यान दे पाते। इसलिए बहुत कम उम्र में ही उन्होंने अपनी शिक्षा और रोजगार दोनों की जिम्मेदारी स्वयं उठाने का निर्णय लिया।
पढ़ाई के साथ आत्मनिर्भर बनने की शुरुआत
बारहवीं के बाद सुनील ने निजी क्षेत्र में काम करना शुरू किया।
वर्ष 2002 से 2004 के बीच उन्होंने डेरावाल नगर, मॉडल टाउन, दिल्ली स्थित एक फर्म में काम किया, जहाँ डॉल्फिन कंपनी के उत्पादों, विशेष रूप से कार सीट कवर आदि की बिक्री से जुड़े कार्य किए जाते थे।
उन्होंने शुरुआत Sales Executive के रूप में की और बाद में Store Keeper की जिम्मेदारी भी संभाली।
यह उनका कॉर्पोरेट या निजी रोजगार क्षेत्र से पहला गंभीर परिचय था। इसी दौर ने उन्हें ग्राहक व्यवहार, बिक्री, स्टॉक प्रबंधन और बाजार की व्यावहारिक समझ दी।
इसके बाद वर्ष 2004 से 2005 के बीच उन्होंने हरियाणा के सोनीपत स्थित Kanak Garden में Kitchen Supervisor के पद पर कार्य किया।
आर्थिक जिम्मेदारियों के बावजूद उन्होंने अपनी पढ़ाई नहीं छोड़ी।
इसी अवधि में उन्होंने School of Open Learning, University of Delhi से B.A. Programme की स्नातक शिक्षा पूरी की।
कंप्यूटर और तकनीकी शिक्षा की ओर रुचि
सुनील की रुचि शुरू से नई चीजें सीखने में रही।
उन्होंने Jetking, Shalimar Bagh, Delhi से कंप्यूटर हार्डवेयर का प्रशिक्षण लेना शुरू किया। इसके साथ ही Arena, Kamla Nagar, Delhi से मल्टीमीडिया और डिजाइनिंग से संबंधित शिक्षा भी प्राप्त की।
आर्थिक कठिनाइयों के कारण वे इन सभी तकनीकी पाठ्यक्रमों को पूरी तरह पूरा नहीं कर सके, लेकिन यहाँ प्राप्त ज्ञान बाद में उनके स्वरोजगार की नींव बना।
यह वह दौर था जब कंप्यूटर और डिजिटल डिजाइनिंग भारत में तेजी से उभर रहे थे। सुनील ने इस बदलाव को पहचाना और नौकरी के सुरक्षित रास्ते के बजाय स्वयं का काम शुरू करने का जोखिम उठाया।
‘दहिया इंटरप्राइज’ से उद्यमिता की शुरुआत
नवंबर 2005 में उन्होंने निजी नौकरी छोड़कर अपने गाँव धीरपुर से Dahiya Enterprise नाम से स्वयं का डिजाइनिंग और प्रिंटिंग व्यवसाय शुरू किया।
एक कंप्यूटर और प्रिंटर के साथ शुरू हुआ यह छोटा-सा व्यवसाय उनके जीवन में उद्यमिता की पहली वास्तविक शुरुआत था।
संसाधन सीमित थे, कोई बड़ा निवेशक नहीं था और परिवार से भी व्यवसाय के लिए विशेष आर्थिक सहायता उपलब्ध नहीं थी। फिर भी उन्होंने अपने कौशल और मेहनत के आधार पर काम आगे बढ़ाने का प्रयास किया।
इसी दौरान परिवार के दबाव और सामाजिक परिस्थितियों के चलते अप्रैल 2006 में उनका विवाह ललिता जी से हुआ।
विवाह के बाद उनकी आर्थिक जिम्मेदारियाँ और बढ़ गईं। इसके बावजूद उन्होंने लगभग 2008 तक अपने छोटे व्यवसाय को संभालने का प्रयास जारी रखा।
नरेला में Om Photo Studio
व्यवसाय का विस्तार करने और आय के बेहतर अवसर तलाशने के उद्देश्य से उन्होंने वर्ष 2008 में धीरपुर स्थित घर से लगभग 26 किलोमीटर दूर नरेला, दिल्ली की मुख्य मार्केट, झंडा चौक के पास ‘Om Photo Studio’ शुरू किया।
अब उन्हें एक तरफ धीरपुर का काम और दूसरी तरफ नरेला का स्टूडियो संभालना पड़ता था।
दो अलग स्थानों पर एक साथ व्यवसाय चलाना आर्थिक और व्यावहारिक रूप से कठिन साबित हुआ। लगातार आने-जाने, खर्च और सीमित संसाधनों के कारण अंततः ये व्यवसाय लंबे समय तक स्थिर नहीं रह सके।
लेकिन इन अनुभवों ने सुनील को व्यवसाय की एक महत्वपूर्ण शिक्षा दी—हर असफल प्रयास भी अगली यात्रा के लिए अनुभव की पूंजी बन जाता है।
Import–Export और Trading Business की कोशिश
इसके बाद उनके जीवन में एक नया अध्याय शुरू हुआ।
अपने बिहार निवासी मित्र मृत्युंजय के सुझाव पर उन्होंने Ocean Trading नाम से Import–Export और ट्रेडिंग का काम शुरू किया।
इस व्यवसाय में टिश्यू पेपर, मिनरल वॉटर, फ्रूट जूस तथा अन्य उत्पादों की ट्रेडिंग की जाती थी।
व्यवसाय को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से उन्होंने बाद में गाड़ियों के Safety Devices से संबंधित उत्पाद बनाने वाली Atlantic Company की फ्रेंचाइजी भी ली।
यह उनके व्यावसायिक जीवन का महत्वाकांक्षी दौर था।
लेकिन साझेदारी में पैदा हुए गंभीर मतभेद और विश्वास से जुड़ी समस्याओं के कारण यह व्यवसाय भी अंततः बंद हो गया।
जीवन एक बार फिर उसी मोड़ पर आ गया जहाँ स्थायी रोजगार की तलाश जरूरी हो गई।
दोबारा नौकरी और बदलती जिम्मेदारियाँ
व्यवसाय बंद होने के बाद सुनील ने फिर निजी नौकरी की ओर रुख किया।
उन्होंने PWD के इलेक्ट्रिकल विभाग से जुड़े कार्यों में एक निजी कंपनी के अंतर्गत Site Visit Supervisor के रूप में काम किया।
इसके बाद उन्होंने LNJP Hospital में अलग-अलग जिम्मेदारियाँ संभालीं। उन्होंने वहाँ Lift Operator, फिर Computer Operator और बाद में दोबारा Supervisor के रूप में कार्य किया।
दिलचस्प रूप से यही वह अस्पताल था जहाँ कभी उनके पिता श्री दरियाव सिंह ने सरकारी सेवा की थी।
इस प्रकार पिता और पुत्र, दोनों के संघर्षपूर्ण जीवन का एक महत्वपूर्ण अध्याय LNJP Hospital से जुड़ा रहा।
UPSC और SSC की तैयारी
रोजगार के साथ-साथ सुनील के भीतर आगे बढ़ने और सरकारी सेवा में जाने की इच्छा लगातार बनी रही।
उन्होंने UPSC और SSC जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं की कोचिंग ली, गंभीरता से तैयारी की और कई परीक्षाओं में भाग भी लिया।
लगभग तीन वर्षों तक उन्होंने प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में अपना महत्वपूर्ण समय लगाया।
उन्हें अपेक्षित सफलता नहीं मिल सकी, लेकिन उनके अनुसार यह समय उनके जीवन की सबसे महत्वपूर्ण बौद्धिक यात्राओं में से एक रहा।
इस तैयारी ने उन्हें केवल परीक्षा का ज्ञान नहीं दिया; इतिहास, संविधान, प्रशासन, समाज, राजनीति और भारतीय सामाजिक संरचना को देखने-समझने का उनका नजरिया भी व्यापक हुआ।
कभी-कभी किसी परीक्षा में सफलता न मिलना भी जीवन में असफलता नहीं होता। वह ज्ञान किसी अन्य दिशा में व्यक्ति की भूमिका निर्धारित कर सकता है।
सुनील कुमार के साथ भी यही हुआ।
Turning Point Coaching Centre
प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में प्राप्त अनुभव को उन्होंने बाद में विद्यार्थियों तक पहुँचाने का निर्णय लिया।
अपने साथी राहुल के साथ उन्होंने Turning Point Coaching Centre शुरू किया।
यहाँ विद्यार्थियों को विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कराई जाने लगी।
यह कार्य उनके लिए केवल आमदनी का माध्यम नहीं था। जिन परीक्षाओं की तैयारी उन्होंने स्वयं की थी, उन्हीं अनुभवों को वे अब दूसरे युवाओं के मार्गदर्शन में इस्तेमाल कर रहे थे।
उनके अनुसार, संस्थान में पढ़े कई विद्यार्थियों ने बाद में सरकारी नौकरियाँ प्राप्त कीं। यह उनके जीवन की उन उपलब्धियों में शामिल रहा जिसमें अपनी व्यक्तिगत परीक्षा-यात्रा का अनुभव दूसरों के भविष्य के लिए उपयोगी बन सका।
इसी कालखंड में उनके पिता श्री दरियाव सिंह का निधन हो गया।
पिता का जाना उनके जीवन में एक गहरा व्यक्तिगत आघात था। जिस व्यक्ति ने अत्यंत कठिन परिस्थितियों में दिल्ली आकर पूरे परिवार की नींव बनाई थी, उसका जीवन संघर्ष सुनील के लिए हमेशा प्रेरणा बना रहा।
अन्ना हजारे आंदोलन और सामाजिक चेतना
वर्ष 2011 के अन्ना हजारे आंदोलन का सुनील कुमार के जीवन पर विशेष प्रभाव पड़ा।
इस आंदोलन के माध्यम से उनके भीतर सार्वजनिक मुद्दों, भ्रष्टाचार, सामाजिक जिम्मेदारी और जनकल्याण को लेकर सक्रियता बढ़ी।
धीरे-धीरे सामाजिक कार्य में उनकी भागीदारी इतनी बढ़ने लगी कि परिवार, बढ़ते खर्च, बच्चों की जिम्मेदारियों और कोचिंग सेंटर के किराए के बीच Turning Point Coaching Centre को चलाए रखना कठिन हो गया और अंततः उसे बंद करना पड़ा।
वर्ष 2002 से 2013 के बीच उन्होंने अनेक प्रकार की निजी नौकरियाँ, व्यापार और स्वरोजगार के प्रयोग किए।
स्थिरता कम रही, लेकिन अनुभव लगातार बढ़ता गया।
हर नौकरी ने कुछ सिखाया, हर व्यवसाय ने बाजार समझाया और हर असफलता ने जीवन को नए नजरिए से देखने की क्षमता दी।
वर्ष 2013 – जीवन का वैचारिक मोड़
सुनील कुमार अपने जीवन में 2013 को एक महत्वपूर्ण परिवर्तन का वर्ष मानते हैं।
इसी समय उन्हें भारतीय संविधान के प्रमुख शिल्पकार और सामाजिक न्याय के महत्वपूर्ण चिंतक डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर के जीवन, विचारों और संघर्ष को विस्तार से पढ़ने और समझने का अवसर मिला।
डॉ. आंबेडकर के विचारों का उनके जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा।
शिक्षा, समानता, सामाजिक न्याय, आत्मसम्मान, संगठन और संवैधानिक अधिकारों को लेकर उनकी समझ विकसित होती गई।
वर्ष 2011 में अन्ना आंदोलन से शुरू हुई जनकल्याण की भावना वर्ष 2013 के बाद धीरे-धीरे डॉ. आंबेडकर के सामाजिक न्याय और समानता से जुड़े विचारों पर आधारित सामाजिक मिशन में परिवर्तित हो गई।
उन्होंने परिवार और रोजगार की जिम्मेदारियों के साथ सामाजिक कार्य के लिए भी नियमित समय देना शुरू किया।
समता सैनिक दल से सामाजिक संगठन की यात्रा
डॉ. आंबेडकर के मिशन से जुड़े संगठित सामाजिक कार्य की उनकी शुरुआत 2013 में समता सैनिक दल से हुई।
यह उनके सामाजिक जीवन का एक नया अध्याय था।
इसके बाद वर्ष 2015 में वे Republican Party of India (RPI) से भी जुड़े।
सितंबर 2016 में उन्हें The Buddhist Society of India – भारतीय बौद्ध महासभा से जुड़ने का अवसर मिला।
इसके बाद उन्होंने संगठन के माध्यम से बौद्ध धम्म, सामाजिक जागरूकता और समुदाय से जुड़े विभिन्न कार्यक्रमों में सक्रिय रूप से कार्य करना जारी रखा।
वर्तमान समय में वे The Buddhist Society of India, जो एक पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट के रूप में कार्य करती है, के Board of Trustees में Delhi Trustee तथा उत्तर भारत प्रभारी की जिम्मेदारी निभा रहे हैं।
बौद्ध धम्म की ओर यात्रा
भारतीय समाज, विभिन्न धार्मिक परंपराओं, सामाजिक असमानताओं और डॉ. आंबेडकर के विचारों का वर्षों तक अध्ययन करने के बाद सुनील कुमार ने वर्ष 2017 में बौद्ध धम्म स्वीकार किया।
इस परिवर्तन के बाद उन्होंने सुनील बौद्ध नाम को अपनी सामाजिक एवं धार्मिक पहचान के रूप में अपनाया।
उनके लिए बौद्ध धम्म केवल धार्मिक पहचान का परिवर्तन नहीं था, बल्कि करुणा, प्रज्ञा, समानता, नैतिकता और मानवता पर आधारित जीवन-पद्धति की ओर एक वैचारिक यात्रा थी।
आज उनका परिवार भी बौद्ध जीवन मूल्यों से जुड़ा हुआ है।
उनकी पत्नी का नाम ललिता है और उनकी तीन बेटियाँ हैं—
इंद्राक्षी, तनिशा और वंशिका।
परिवार उनके जीवन के संघर्षों, सामाजिक गतिविधियों और निरंतर बदलते सफर का सबसे निकट साक्षी रहा है।
Buddhist Personal Law के लिए सक्रियता
वर्ष 2018 से सुनील बौद्ध All India Action Committee for Buddhist Personal Law में राष्ट्रीय महासचिव के रूप में कार्य कर रहे हैं।
इस मंच का उद्देश्य भारत में बौद्ध समुदाय से जुड़े व्यक्तिगत कानूनों और कानूनी अधिकारों के विषय में जागरूकता एवं अधिकारों से संबंधित प्रयास करना है।
अपने सामाजिक कार्यों में सुनील बौद्ध ने विशेष रूप से संविधान, सामाजिक अधिकार, बौद्ध समुदाय के अधिकार और वंचित वर्गों के कल्याण से जुड़े विषयों पर ध्यान केंद्रित किया है।
अपने स्वयं के NGO की स्थापना
कई वर्षों तक विभिन्न सामाजिक एवं धार्मिक संगठनों के साथ कार्य करने के अनुभव के बाद उन्होंने नवंबर 2022 में दो सामाजिक संस्थाओं की स्थापना की—
Ashoka Raj Foundation
और
Live Lord Buddha Foundation
इन दोनों संस्थाओं के वे Founder हैं।
इन संस्थाओं के माध्यम से उनका उद्देश्य सामाजिक जागरूकता, शिक्षा, मानव कल्याण, बौद्ध मूल्यों, सामाजिक समानता और जरूरतमंद समुदायों से जुड़े कार्यों को आगे बढ़ाना है।
ऐतिहासिक चाँदनी चौक बुद्ध विहार से जुड़ाव
सुनील बौद्ध दिल्ली के ऐतिहासिक चाँदनी चौक बुद्ध विहार से भी लंबे समय से जुड़े हुए हैं।
वे बुद्ध विहार के Caretaker होने के साथ उसकी समिति में सक्रिय पदाधिकारी के रूप में भी जिम्मेदारी निभाते रहे हैं।
बुद्ध विहार से उनका जुड़ाव केवल प्रशासनिक जिम्मेदारी तक सीमित नहीं है। यह उनके धार्मिक और सामाजिक जीवन का भी महत्वपूर्ण केंद्र रहा है।
सामाजिक कार्य के चौदह वर्ष से अधिक
लगभग चौदह वर्षों की सामाजिक एवं धार्मिक यात्रा में सुनील बौद्ध ने विशेष रूप से बौद्ध समाज तथा SC, ST और OBC समुदायों की सामाजिक परिस्थितियों, संस्कृति, समस्याओं, शिक्षा, कल्याण और अधिकारों से जुड़े विषयों पर काम किया है।
उनकी अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि ने उन्हें सामाजिक और आर्थिक वंचना को बहुत करीब से देखने का अवसर दिया।
उनके दादा जूती बनाने वाले कारीगर थे।
उनके पिता सीमित संसाधनों के बावजूद दसवीं तक पढ़े, गाँव छोड़कर दिल्ली आए और संघर्ष करके सरकारी सेवा में पहुँचे।
सुनील स्वयं आर्थिक कठिनाइयों के बीच पढ़े, कम उम्र में काम शुरू किया, प्राइवेट नौकरी की, व्यवसाय किए, व्यवसाय बंद होते देखे, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी की, कोचिंग सेंटर चलाया और फिर सामाजिक जीवन की ओर बढ़े।
इसलिए उनके लिए सामाजिक असमानता केवल किताबों में पढ़ा हुआ विषय नहीं, बल्कि परिवार की कई पीढ़ियों के जीवन से जुड़ा वास्तविक अनुभव रहा है।
व्यवसाय और सामाजिक जीवन का संतुलन
सामाजिक गतिविधियों के बावजूद सुनील बौद्ध ने अपने परिवार और रोजगार की जिम्मेदारियों को भी लगातार निभाया है।
डिजाइनिंग, प्रिंटिंग और कंप्यूटर से शुरू हुआ उनका संबंध आज भी उनके व्यावसायिक जीवन का हिस्सा है।
2005 में छोटे स्तर पर शुरू हुई कंप्यूटर आधारित स्वरोजगार की यात्रा वर्ष 2026 में भी किसी न किसी रूप में जारी है।
तीन दशकों से अधिक समय के जीवन अनुभवों में उन्होंने Sales Executive, Store Keeper, Kitchen Supervisor, Designer, Printer, Photographer, Trader, Entrepreneur, Site Supervisor, Lift Operator, Computer Operator, Competitive Examination Aspirant, Teacher, Coaching Centre Operator, Social Worker और विभिन्न संस्थाओं में जिम्मेदार पदाधिकारी जैसी अनेक भूमिकाएँ निभाई हैं।
शायद यही विविध अनुभव उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषता है।
तीन पीढ़ियों की एक कहानी
सुनील बौद्ध की कहानी केवल एक व्यक्ति की जीवनी नहीं है।
यह तीन पीढ़ियों में आए सामाजिक परिवर्तन की कहानी भी है।
पहली पीढ़ी में उनके दादा बनवारी लाल थे—एक जूती बनाने वाले मेहनतकश कारीगर, जिनके पास अपनी खेती की जमीन तक नहीं थी।
दूसरी पीढ़ी में उनके पिता दरियाव सिंह थे—जिन्होंने गाँव में शिक्षा प्राप्त की, दिल्ली का रास्ता चुना और संघर्ष करके सरकारी सेवा तक पहुँचे।
तीसरी पीढ़ी में सुनील बौद्ध हैं—जिन्होंने शिक्षा, तकनीक, निजी रोजगार, उद्यमिता, प्रतियोगी परीक्षाओं, अध्यापन और सामाजिक संगठनों के माध्यम से अपना रास्ता बनाया।
यह यात्रा उस परिवर्तन को दर्शाती है जिसमें श्रम से शिक्षा, शिक्षा से आत्मनिर्भरता और आत्मनिर्भरता से सामाजिक चेतना का सफर दिखाई देता है।
असफलताओं को अनुभव में बदलने वाला जीवन
सुनील बौद्ध के जीवन की सबसे महत्वपूर्ण बात यह नहीं है कि उन्होंने कितने व्यवसाय शुरू किए या कितनी नौकरियाँ बदलीं।
महत्वपूर्ण यह है कि हर बार परिस्थितियाँ बदलने के बाद उन्होंने स्वयं को दोबारा खड़ा करने का प्रयास किया।
कभी डिजाइनिंग-प्रिंटिंग का छोटा व्यवसाय था।
कभी फोटो स्टूडियो।
कभी Import–Export।
कभी Automobile Safety Products की फ्रेंचाइजी।
कभी सरकारी विभागों से जुड़े निजी कार्य।
कभी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी।
कभी Coaching Centre।
और बाद में सामाजिक एवं धार्मिक संस्थाओं में जिम्मेदारियाँ।
जीवन का रास्ता सीधा नहीं रहा, लेकिन यात्रा कभी पूरी तरह रुकी भी नहीं।
उनका जीवन इस विचार का उदाहरण है कि व्यक्ति की पहचान केवल उसकी सफलताओं से नहीं बनती; उसकी पहचान इस बात से भी बनती है कि वह अपनी असफलताओं के बाद कितनी बार स्वयं को दोबारा खड़ा करता है।
वर्तमान जीवन
वर्ष 2026 में सुनील बौद्ध अपने परिवार, कंप्यूटर से जुड़े कार्य और सामाजिक-धार्मिक जिम्मेदारियों के बीच सक्रिय हैं।
उनकी सामाजिक यात्रा का केंद्र शिक्षा, समानता, संवैधानिक जागरूकता, बौद्ध धम्म, सामाजिक संगठन और वंचित समुदायों के कल्याण से जुड़े विषय हैं।
वे वर्तमान में विभिन्न सामाजिक एवं धार्मिक संस्थाओं के साथ सक्रिय रूप से जुड़े हुए हैं।
उनकी प्रमुख जिम्मेदारियों एवं पहलों में शामिल हैं:
The Buddhist Society of India – भारतीय बौद्ध महासभा
Delhi Trustee एवं उत्तर भारत प्रभारी
All India Action Committee for Buddhist Personal Law
राष्ट्रीय महासचिव – वर्ष 2018 से
Ashoka Raj Foundation
Founder
Live Lord Buddha Foundation
Founder
चाँदनी चौक बुद्ध विहार, दिल्ली
Caretaker एवं सक्रिय कमेटी पदाधिकारी
इसके अतिरिक्त उनका लंबे समय से बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर के विचारों, बौद्ध धम्म तथा SC/ST/OBC समुदायों के सामाजिक एवं कल्याण से जुड़े विषयों पर कार्य जारी है।
जीवन दर्शन
सुनील बौद्ध की जीवन यात्रा में एक बात बार-बार दिखाई देती है—
परिस्थितियाँ व्यक्ति की शुरुआत तय कर सकती हैं, लेकिन उसकी अंतिम दिशा उसके निर्णय, शिक्षा, अनुभव और संघर्ष तय करते हैं।
एक भूमिहीन कारीगर परिवार से शुरू हुई इस कहानी ने पहले सरकारी नौकरी तक का रास्ता बनाया, फिर अगली पीढ़ी को शिक्षा मिली और उसी शिक्षा ने सामाजिक चेतना का रूप लिया।
उनकी यात्रा में गरीबी भी रही, रोजगार की अनिश्चितता भी रही, व्यवसाय की असफलताएँ भी आईं और प्रतियोगी परीक्षाओं में निराशा भी मिली।
लेकिन यही अनुभव बाद में उनकी सामाजिक सोच और जीवन दृष्टि का हिस्सा बन गए।
उनका मानना है कि समाज का वास्तविक विकास केवल किसी एक व्यक्ति की आर्थिक प्रगति से नहीं, बल्कि शिक्षा, समान अवसर, सामाजिक सम्मान और अधिकारों के प्रति जागरूकता से संभव होता है।
विरासत और लक्ष्य
सुनील बौद्ध अपने जीवन को किसी अंतिम उपलब्धि के रूप में नहीं देखते।
उनके लिए यह अभी भी जारी यात्रा है।
उनके पिता दरियाव सिंह ने परिवार को जिस सामाजिक और आर्थिक स्थिति से उठाकर दिल्ली में एक नई शुरुआत दी, सुनील बौद्ध उसी विरासत को शिक्षा और सामाजिक जागरूकता के माध्यम से आगे बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं।
वे चाहते हैं कि आने वाली पीढ़ियाँ अपने इतिहास और संघर्ष को जानें, शिक्षा को प्राथमिकता दें, आत्मनिर्भर बनें और भारतीय संविधान द्वारा दिए गए अपने अधिकारों एवं कर्तव्यों के प्रति जागरूक रहें।
उनके जीवन की कहानी संघर्ष से सफलता की किसी काल्पनिक सीधी रेखा की कहानी नहीं है।
यह उससे अधिक वास्तविक कहानी है—
गिरने, सीखने, बदलने, फिर उठने और लगातार आगे बढ़ते रहने की कहानी।
दादा के हाथों की कारीगरी से शुरू हुई पारिवारिक यात्रा, पिता की सरकारी नौकरी, और फिर शिक्षा, तकनीक, व्यवसाय एवं समाज सेवा तक पहुँची अगली पीढ़ी का यह सफर बताता है कि परिवर्तन अक्सर एक दिन में नहीं आता।
कभी-कभी उसे आने में कई पीढ़ियाँ लगती हैं।
और शायद इसी यात्रा का सबसे सार्थक संदेश यह है—
“संघर्ष ने रास्ता कठिन बनाया, शिक्षा ने दृष्टि दी, अनुभव ने दिशा बदली और सामाजिक चेतना ने जीवन को एक उद्देश्य दिया।”
व्यक्तिगत परिचय
नाम: सुनील बौद्ध (सुनील कुमार)
जन्म: 1984
जन्म एवं निवास: धीरपुर गाँव, उत्तर दिल्ली, दिल्ली – 110009
पिता: स्वर्गीय श्री दरियाव सिंह
माता: श्रीमती धनपति देवी
पत्नी: श्रीमती ललिता
संतान: इंद्राक्षी, तनिशा एवं वंशिका
शिक्षा: B.A. Programme, School of Open Learning, University of Delhi
क्षेत्र: सामाजिक कार्य, बौद्ध धम्म, सामाजिक एवं संवैधानिक जागरूकता, कंप्यूटर एवं स्वरोजगार
सामाजिक सक्रियता: 2011 से
आंबेडकर मिशन से सक्रिय जुड़ाव: 2013 से
बौद्ध धम्म ग्रहण: 2017
ईमेल: dahiya149@gmail.com
संस्था की वेबसाइट: TheBuddhistSocietyOfIndia.com
प्रमुख सामाजिक भूमिकाएँ
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The Buddhist Society of India – Delhi Trustee एवं उत्तर भारत प्रभारी
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All India Action Committee for Buddhist Personal Law – राष्ट्रीय महासचिव
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Ashoka Raj Foundation – Founder
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Live Lord Buddha Foundation – Founder
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ऐतिहासिक चाँदनी चौक बुद्ध विहार – Caretaker एवं सक्रिय कमेटी पदाधिकारी
एक पंक्ति में परिचय
सुनील बौद्ध एक दिल्ली-आधारित सामाजिक कार्यकर्ता, उद्यमी और बौद्ध धम्म से जुड़े संगठनकर्ता हैं, जिनकी जीवन यात्रा एक साधारण श्रमिक परिवार से शिक्षा, आत्मनिर्भरता और सामाजिक अधिकारों के लिए सक्रिय सेवा तक पहुँची है।
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