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Dr. Pandit Sagar Tripathi

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Dr. Pandit Sagar Tripathi
Dr. Pandit Sagar Tripathi
Name डॉ. पण्डित सागर त्रिपाठी
Born सुल्तानपुर, उत्तर प्रदेश, भारत
Age 76 वर्ष
Residence 1/25, न्यू पुष्प विहार, कोलाबा पोस्ट ऑफिस के सामने, कोलाबा, मुंबई – 400005, महाराष्ट्र, भारत
Languages हिन्दी, उर्दू
Education प्रयाग विश्वविद्यालय / इलाहाबाद विश्वविद्यालय, के.सी. लॉ कॉलेज, डाटामैटिक्स मैनेजमेंट, ट्रैवल रिसर्च एंड मैनेजमेंट, तकनीकी एवं प्रशासनिक अध्ययन, प्रबंधन, ललित कला, मनोवैज्ञानिक विश्लेषण एवं शोध
Occupation साहित्यकार, कवि, व्यवसायी, सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन प्रमुख
Known for हिन्दी-उर्दू साहित्य, ग़ज़ल, दोहा, हाइकू, सामाजिक समरसता, विश्वबंधुत्व
Chairman पृथ्वी ग्रुप ऑफ कम्पनीज़
World President विश्व ब्राह्मण परिषद
Vice Chairman वर्ल्ड सूफ़ी काउन्सिल
Founder Patron आई.पी.सी.
National Spokesperson राष्ट्रीय अम्न महासंघ
Notable works कबन्ध, शब्दवेध, क्षितिज, शर संधान, प्रतिध्वनि, सागर सतसई, सागर सप्तशती, सागर की लहरें, रचना और रचनाकार, ग़ज़ल सप्तक, कहकशाँ, किर्चियाँ, उफ़ुक़, अलिफ़, जज़ीरा, माँ, सायबान-ए-रहमत, शंखनाद (प्रकाशनाधीन)
Literary output 87,000+ अशआर, 17,000+ ग़ज़लें, 5,000 दोहे, 3,500 हाइकू, 5,000 छंद/मुक्तक/क़तआत, 3,500 गीत/कविताएँ, 1,500+ अछंदस रचनाएँ
Books published लगभग 23
Countries visited for literary events लगभग 44 देश
Literary events participated 3,700+ मुशायरे, कवि सम्मेलन, साहित्यिक नशिस्तें, सेमिनार और गोष्ठियाँ
Book releases and events organised लगभग 200 पुस्तकों का लोकार्पण; 1,000+ साहित्यिक गोष्ठियों/कार्यशालाओं/आयोजनों का आयोजन, संचालन अथवा संवर्धन
Awards/Honours 1,750+ सम्मान, प्रमाणपत्र, प्रशस्ति-पत्र, मानपत्र, अलंकरण, मानद उपाधियाँ एवं सहभागिता प्रमाणपत्र
Notable awards लाइफ़ टाइम अचीवमेंट सम्मान, साहित्य गौरव (बी.एच.यू.), अमीर ख़ुसरो सम्मान, साहित्य रत्न, साहित्य शिरोमणि, साहित्य विभूषण, ब्राह्मण भूषण, मीर अवार्ड, ग़ालिब अवार्ड, शहंशाह-ए-अदब, कोहिनूर-ए-अदब, आदि
Interests सृजन और लेखन, गहन अध्ययन, साहित्यिक चर्चा, बैडमिंटन, यात्रा, मेहमाननवाज़ी, विशेष व्यंजन पकाना
Mobile +91 9920052915, +91 9820052915
Email sagartripathi@hotmail.com, sagartripathi7643@gmail.com
Website www.sagartripathi.com

डॉ. पण्डित सागर त्रिपाठी

साहित्य, साधना, विश्वबंधुत्व और मानवीय सौहार्द का एक विराट व्यक्तित्व

“जिस व्यक्ति ने आधी सदी से अधिक समय शब्दों की साधना में बिताया हो, हजारों रचनाएँ साहित्य को समर्पित की हों और दुनिया के अनेक देशों में हिन्दी-उर्दू की साझा संस्कृति की सुगंध पहुँचाई हो, उसका परिचय केवल पदों और पुरस्कारों से नहीं, उसकी साधना से होता है।”

डॉ. पण्डित सागर त्रिपाठी भारतीय साहित्य जगत के उन बहुआयामी व्यक्तित्वों में से हैं, जिनके जीवन में साहित्य, अध्यात्म, सामाजिक समरसता, विश्वबंधुत्व, अध्ययन, संगठन और मानवीय संवेदनाएँ एक साथ दिखाई देती हैं।

उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर में जन्मे डॉ. सागर त्रिपाठी आज “पृथ्वी ग्रुप ऑफ कम्पनीज़” के चेयरमैन, विश्व ब्राह्मण परिषद के विश्व अध्यक्ष, वर्ल्ड सूफ़ी काउन्सिल के वाइस चेयरमैन, आई.पी.सी. के फाउंडर पेट्रन तथा राष्ट्रीय अम्न महासंघ के राष्ट्रीय प्रवक्ता के रूप में विभिन्न सामाजिक, सांस्कृतिक और संगठनात्मक दायित्वों से जुड़े हुए हैं।

परंतु इन सभी पदों और उपलब्धियों से कहीं अधिक उनकी पहचान उस व्यक्ति की है जिसने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा पढ़ने, लिखने, सीखने, विचार करने और साहित्य के माध्यम से मनुष्यों को जोड़ने में समर्पित किया है।


प्रारंभिक जीवन और व्यक्तित्व

डॉ. पण्डित सागर त्रिपाठी का जन्म सुल्तानपुर, उत्तर प्रदेश में हुआ।

आज 76 वर्ष की आयु में भी उनकी सक्रियता, जिज्ञासा और सीखने की इच्छा किसी युवा विद्यार्थी जैसी दिखाई देती है।

उनके व्यक्तित्व की सबसे उल्लेखनीय विशेषताओं में से एक उनकी असाधारण विनम्रता है।

दशकों तक अध्ययन करने, अनेक शैक्षिक एवं तकनीकी योग्यताएँ अर्जित करने, हजारों साहित्यिक रचनाएँ लिखने और दुनिया के अनेक देशों में साहित्यिक मंचों पर भाग लेने के बावजूद वे स्वयं को आज भी बड़े गर्व से नहीं, बल्कि अत्यंत विनम्रता के साथ—

“मूलतः आज भी एक विद्यार्थी”

कहना पसंद करते हैं।

यही भाव उनके व्यक्तित्व को उनकी उपलब्धियों से भी बड़ा बनाता है।


ज्ञान के प्रति आजीवन समर्पण

डॉ. सागर त्रिपाठी का मानना रहा है कि सीखने की कोई अंतिम सीमा नहीं होती।

उन्होंने अपने जीवन में लगभग पाँच दशकों तक निरंतर अध्ययन, लेखन और बौद्धिक साधना को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाए रखा।

उनकी शिक्षा एवं अध्ययन यात्रा में प्रमुख रूप से—

  • प्रयाग विश्वविद्यालय / इलाहाबाद विश्वविद्यालय

  • के.सी. लॉ कॉलेज

  • डाटामैटिक्स मैनेजमेंट

  • ट्रैवल रिसर्च एंड मैनेजमेंट

  • तकनीकी एवं प्रशासनिक अध्ययन

  • प्रबंधन

  • ललित कला

  • मनोवैज्ञानिक विश्लेषण एवं शोध

जैसे अनेक अध्ययन क्षेत्र शामिल रहे हैं।

इसके अतिरिक्त उन्हें देश-विदेश से अनेक शैक्षिक, विधिक, तकनीकी, प्रबंधन, वायुसेवा, डिप्लोमा, प्रमाणपत्र, सनद एवं मानद उपाधियाँ प्राप्त हुई हैं।

परंतु इतने लंबे शैक्षिक सफर के बाद भी उनका प्रिय परिचय यही है—

“ज्ञान के विराट संसार में मैं आज भी एक विद्यार्थी हूँ।”


साहित्य की आधी सदी से अधिक की साधना

डॉ. पण्डित सागर त्रिपाठी का साहित्यिक जीवन लगभग पाँच दशकों की सतत साधना का परिणाम है।

हिन्दी और उर्दू दोनों भाषाओं में उनकी गहरी पकड़ ने उन्हें साहित्य के अनेक रूपों में रचना करने का अवसर दिया।

कविता, ग़ज़ल, दोहा, हाइकू, गीत, मुक्तक, छंद, हम्द, नात, मुनाजात, सलाम, मनक़बत, मर्सिया, रुबाई, नज़्म और क़तआत सहित साहित्य की अनेक विधाओं में उन्होंने व्यापक सृजन किया है।

उनकी लेखनी में कभी आध्यात्मिकता की गंभीरता दिखाई देती है, कभी मानवीय रिश्तों की कोमलता, कभी सामाजिक विसंगतियों पर प्रश्न और कभी प्रेम, करुणा एवं भाईचारे का संदेश।

उनके लिए साहित्य केवल शब्दों की सजावट नहीं है।

साहित्य उनके लिए मनुष्यता को मनुष्यता से जोड़ने का माध्यम है।


प्रमुख हिन्दी कृतियाँ

डॉ. सागर त्रिपाठी की हिन्दी साहित्य में प्रकाशित एवं प्रकाशनाधीन प्रमुख कृतियों में—

कबन्ध
शब्दवेध — तीन भाषाओं में
क्षितिज
शर संधान
प्रतिध्वनि
सागर सतसई — दोहा संग्रह
सागर सप्तशती — दोहा संग्रह
शंखनाद — प्रकाशनाधीन

जैसी रचनाएँ उल्लेखनीय हैं।

इन कृतियों में उनकी भाषा, जीवनानुभव, दर्शन और साहित्य के प्रति उनके दीर्घकालीन अध्ययन की छाप दिखाई देती है।


ग़ज़ल और उर्दू साहित्य में योगदान

हिन्दी साहित्य के साथ-साथ उर्दू और ग़ज़ल की दुनिया में भी डॉ. सागर त्रिपाठी की सक्रिय उपस्थिति रही है।

उनके प्रमुख ग़ज़ल एवं साहित्यिक संग्रहों में—

सागर की लहरें
रचना और रचनाकार
ग़ज़ल सप्तक
कहकशाँ
किर्चियाँ
उफ़ुक़
अलिफ़
जज़ीरा
माँ — द्वितीय संस्करण
सायबान-ए-रहमत — नातिया संग्रह

आदि सम्मिलित हैं।

उपलब्ध विवरण के अनुसार उनकी प्रकाशित एवं साहित्यिक पुस्तकों की संख्या लगभग 23 तक पहुँच चुकी है।


शब्दों का विराट सृजन संसार

डॉ. पण्डित सागर त्रिपाठी की साहित्यिक यात्रा का विस्तार केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं है।

उनकी साहित्यिक साधना से जुड़े उपलब्ध आँकड़े उनके लेखन के विशाल संसार की झलक देते हैं।

उनके खाते में—

87,000 से अधिक अशआर

17,000 से अधिक ग़ज़लें

के साथ-साथ बड़ी संख्या में—

हम्द
नात
मुनाजात
सलाम
मनक़बत
मर्सिया
रुबाइयाँ
नज़्में
क़तआत

का सृजन शामिल है।

इसके अतिरिक्त उन्होंने लगभग—

5,000 दोहे
3,500 हाइकू
5,000 छंद, मुक्तक और क़तआत
3,500 गीत एवं कविताएँ
और
1,500 से अधिक अछंदस रचनाएँ

सृजित की हैं।

ये संख्याएँ केवल रचनाओं की गिनती नहीं हैं, बल्कि उन असंख्य रातों, विचारों और अनुभवों की स्मृतियाँ हैं जिन्हें उन्होंने शब्दों का रूप दिया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ज़ुबान से डॉ. सागर त्रिपाठी का शेर

डॉ. पण्डित सागर त्रिपाठी के साहित्यिक जीवन का एक अत्यंत गौरवपूर्ण और यादगार अध्याय तब जुड़ा, जब उनका प्रसिद्ध शेर भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ज़ुबान से देश के सर्वोच्च लोकतांत्रिक मंच — संसद — में सुनाई दिया।

उनका चर्चित शेर है:

**“जब हौसला बना लिया ऊँची उड़ान का,

फिर देखना फ़िज़ूल है कद आसमान का।”**

यह शेर समय के साथ केवल एक साहित्यिक पंक्ति नहीं रहा, बल्कि साहस, आत्मविश्वास, संकल्प और ऊँचे लक्ष्य का प्रेरक संदेश बन गया।


25 जून 2019 — संसद में शेर का उल्लेख

25 जून 2019 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद में अपने भाषण के दौरान डॉ. सागर त्रिपाठी का यही प्रसिद्ध शेर पढ़ा।

देश के विकास, ऊँची सोच और दृढ़ संकल्प का संदेश देते हुए प्रधानमंत्री ने कहा:

**“जब हौसला बना लिया ऊँची उड़ान का,

फिर देखना फ़िज़ूल है कद आसमान का।”**

किसी कवि या शायर के लिए यह अत्यंत सम्मान की बात होती है कि उसकी रचना संसद के सदन में देश के प्रधानमंत्री की आवाज़ में गूँजे।

यह क्षण डॉ. सागर त्रिपाठी के साहित्यिक जीवन की एक विशेष पहचान बन गया।


दैनिक जागरण में विशेष उल्लेख

इस ऐतिहासिक प्रसंग को प्रसिद्ध हिंदी समाचार पत्र दैनिक जागरण ने भी प्रमुखता से प्रकाशित किया।

अखबार में डॉ. सागर त्रिपाठी के इस शेर का उल्लेख करते हुए बताया गया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद में अपने संबोधन के दौरान इसे पढ़ा।

इस प्रकाशित समाचार ने शेर और उसके रचनाकार दोनों को व्यापक जनमानस तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।


झाँसी के मुशायरे से संसद तक

उपलब्ध समाचार सामग्री के अनुसार डॉ. सागर त्रिपाठी ने यह शेर पहली बार दैनिक जागरण द्वारा झाँसी में आयोजित एक अखिल भारतीय मुशायरे में पढ़ा था।

उस साहित्यिक मंच से शुरू हुई इस शेर की यात्रा धीरे-धीरे मुशायरों, कवि सम्मेलनों, साहित्यिक कार्यक्रमों और विभिन्न मंचों तक पहुँचती गई।

बाद में यही शेर उनके चर्चित ग़ज़ल संग्रह—

“सागर की लहरें”

में भी शामिल किया गया।

समय के साथ यह शेर उनकी साहित्यिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया और विभिन्न कार्यक्रमों में श्रोताओं की ओर से इसे सुनाने की फरमाइश की जाने लगी।


राष्ट्रीय मीडिया और टेलीविजन पर गूँज

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा संसद में इस शेर को पढ़े जाने के दृश्य देश के विभिन्न समाचार माध्यमों और टेलीविजन चैनलों पर प्रसारित हुए।

लोकसभा की कार्यवाही और राष्ट्रीय समाचार प्रसारणों में यह शेर प्रमुखता से सुनाई दिया।

इस प्रकार एक साहित्यिक पंक्ति ने—

मुशायरे के मंच से संसद तक और संसद से राष्ट्रीय मीडिया तक

अपनी एक विशेष यात्रा पूरी की।


इंडिया-अमेरिका आइडियाज़ मीट में पुनः उल्लेख

डॉ. सागर त्रिपाठी द्वारा उपलब्ध कराई गई जानकारी के अनुसार 22 जुलाई को आयोजित इंडिया-अमेरिका आइडियाज़ मीट में भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा उनके इसी प्रसिद्ध शेर का उल्लेख किया गया।

उनके अनुसार, एक वर्ष के भीतर प्रधानमंत्री द्वारा उनके शेर का कई बार उद्धरण किया जाना उनके लिए अत्यंत गर्व और भावनात्मक प्रसन्नता का विषय रहा।

यह घटना उनके साहित्यिक जीवन में केवल सम्मान नहीं, बल्कि उनके शब्दों की व्यापक स्वीकार्यता का प्रतीक भी बनी।


हौसले की पहचान बन चुका शेर

डॉ. सागर त्रिपाठी के हजारों अशआर में यह शेर एक विशेष स्थान रखता है:

**“जब हौसला बना लिया ऊँची उड़ान का,

फिर देखना फ़िज़ूल है कद आसमान का।”**

इस शेर की सबसे बड़ी विशेषता इसकी सरलता और व्यापक अर्थ है।

यह मनुष्य को प्रेरित करता है कि जब लक्ष्य बड़ा हो और इरादा दृढ़ हो, तो अपनी सीमाओं को देखने के बजाय अपनी उड़ान पर ध्यान देना चाहिए।

इसी कारण यह शेर साहित्य की दुनिया से आगे बढ़कर प्रेरणा और आत्मविश्वास का प्रतीक बन गया।


डॉ. सागर त्रिपाठी के साहित्यिक जीवन का गौरवपूर्ण क्षण

किसी साहित्यकार के लिए इससे बड़ी प्रसन्नता क्या हो सकती है कि उसकी रचना देश के प्रधानमंत्री की ज़ुबान से संसद में सुनाई दे।

डॉ. सागर त्रिपाठी के लिए यह क्षण उनकी लगभग आधी सदी की साहित्यिक साधना का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पड़ाव है।

यह केवल एक शेर की प्रसिद्धि की कहानी नहीं है, बल्कि इस बात का उदाहरण भी है कि सच्ची और प्रभावशाली रचना अपने रचनाकार से आगे निकलकर समाज की आवाज़ बन सकती है।

**जिस शेर ने कभी एक मुशायरे में तालियाँ बटोरी थीं,

वही शेर एक दिन देश की संसद में गूँज उठा।**

**जो पंक्ति कभी कागज़ पर उतरी थी,

वही समय के साथ राष्ट्रीय मंच की आवाज़ बन गई।**

और इस पूरी यात्रा का सार खुद डॉ. सागर त्रिपाठी के शब्दों में समाया हुआ है—

**“जब हौसला बना लिया ऊँची उड़ान का,

फिर देखना फ़िज़ूल है कद आसमान का।”**

— डॉ. पण्डित सागर त्रिपाठी


विश्व मंच पर हिन्दी और उर्दू की आवाज़

डॉ. सागर त्रिपाठी की साहित्यिक यात्रा भारत की सीमाओं तक सीमित नहीं रही।

उन्होंने विश्व के अनेक देशों में आयोजित मुशायरों, कवि सम्मेलनों, साहित्यिक गोष्ठियों, सेमिनारों, नशिस्तों और सांस्कृतिक आयोजनों में भाग लिया है।

उपलब्ध विवरण के अनुसार वे लगभग 44 देशों में साहित्यिक एवं सांस्कृतिक आयोजनों में उपस्थित रहे हैं।

उनकी साहित्यिक यात्राओं में प्रमुख रूप से—

अमेरिका, कनाडा, इंग्लैंड, स्कॉटलैंड, फ्रांस, स्विट्ज़रलैंड, नॉर्वे, स्पेन, इटली, जर्मनी, पुर्तगाल, स्वीडन, ऑस्ट्रिया, हॉलैंड, नेपाल, सिंगापुर, फिजी, थाईलैंड, हांगकांग, जापान, मलेशिया, इंडोनेशिया, सऊदी अरब, क़तर, मस्कत, संयुक्त अरब अमीरात, दुबई, बहरीन, मिस्र, जॉर्डन, तुर्किये, ग्रीस, मॉरीशस, सलाला, माले और श्रीलंका

सहित अनेक देशों की यात्राएँ सम्मिलित रही हैं।

इन यात्राओं ने उन्हें केवल एक कवि या साहित्यकार के रूप में नहीं, बल्कि भारतीय भाषाओं, संस्कृति और साझा मानवीय विरासत के प्रतिनिधि के रूप में भी पहचान दी।


हजारों साहित्यिक आयोजनों में सहभागिता

डॉ. सागर त्रिपाठी की सार्वजनिक साहित्यिक यात्रा भी अत्यंत व्यापक रही है।

उन्होंने विश्व भर में 3,700 से अधिक मुशायरों, कवि सम्मेलनों, साहित्यिक नशिस्तों, सेमिनारों और गोष्ठियों में सहभागिता की है।

इन आयोजनों में उन्होंने केवल कविता-पाठ ही नहीं किया, बल्कि अनेक अवसरों पर—

संयोजन
संरक्षण
मंच संचालन
काव्य पाठ
साहित्यिक मार्गदर्शन

की भूमिकाएँ भी निभाई हैं।

इसके अतिरिक्त लगभग—

200 पुस्तकों का लोकार्पण

तथा

1,000 से अधिक साहित्यिक गोष्ठियों, कार्यशालाओं और आयोजनों

का आयोजन, संचालन अथवा संवर्धन उनके साहित्यिक जीवन का हिस्सा रहा है।


धर्म से ऊपर मानवता और संवाद

डॉ. सागर त्रिपाठी के सामाजिक व्यक्तित्व का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पक्ष सर्वधर्म सद्भाव है।

एक ओर वे विश्व ब्राह्मण परिषद के विश्व अध्यक्ष के रूप में दीर्घकाल से जुड़े हुए हैं, तो दूसरी ओर वर्ल्ड सूफ़ी काउन्सिल के वाइस चेयरमैन के रूप में भी संवाद और आध्यात्मिक भाईचारे से जुड़े प्रयासों में सक्रिय हैं।

यह अपने आप में उनके व्यक्तित्व का महत्वपूर्ण संदेश है—

परम्परा से जुड़े रहना और साथ ही दूसरे धर्मों, भाषाओं और संस्कृतियों के प्रति सम्मान रखना एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की वास्तविक शक्ति हैं।

हम्द, नात, सलाम, मनक़बत और मर्सिया की पवित्र महफ़िलों में उनकी नियमित भागीदारी उनकी इसी व्यापक सांस्कृतिक दृष्टि को दर्शाती है।


विश्व ब्राह्मण परिषद से पाँच दशकों का संबंध

डॉ. पण्डित सागर त्रिपाठी लगभग 50 वर्षों से विश्व ब्राह्मण परिषद से जुड़े हुए हैं तथा 1976 से निरंतर विश्व अध्यक्ष के रूप में उनके योगदान का उल्लेख किया गया है।

इतने लंबे समय तक किसी संस्था, विचार और सामाजिक उद्देश्य से जुड़े रहना स्वयं में एक दीर्घकालीन प्रतिबद्धता का प्रमाण है।

उनकी संगठनात्मक सोच का केंद्र केवल पद धारण करना नहीं, बल्कि संवाद, सामाजिक समन्वय और सांस्कृतिक मूल्यों का संरक्षण रहा है।


व्यावसायिक जीवन

साहित्य और सामाजिक जीवन के साथ-साथ डॉ. सागर त्रिपाठी व्यवसाय और प्रबंधन के क्षेत्र में भी सक्रिय रहे हैं।

वे—

“पृथ्वी ग्रुप ऑफ कम्पनीज़” के चेयरमैन

हैं।

व्यवसाय के साथ साहित्यिक और सामाजिक गतिविधियों में दशकों तक समान ऊर्जा के साथ सक्रिय रहना उनके व्यक्तित्व की बहुआयामी प्रकृति को दर्शाता है।


प्रमुख सामाजिक एवं संगठनात्मक दायित्व

डॉ. पण्डित सागर त्रिपाठी विभिन्न संस्थाओं और संगठनों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियाँ निभाते रहे हैं।

उनकी प्रमुख भूमिकाएँ हैं—

चेयरमैन — पृथ्वी ग्रुप ऑफ कम्पनीज़

विश्व अध्यक्ष — विश्व ब्राह्मण परिषद

वाइस चेयरमैन — वर्ल्ड सूफ़ी काउन्सिल

फाउंडर पेट्रन — आई.पी.सी.

राष्ट्रीय प्रवक्ता — राष्ट्रीय अम्न महासंघ

इन जिम्मेदारियों में उनके व्यक्तित्व के तीन महत्वपूर्ण पक्ष दिखाई देते हैं—

नेतृत्व, संवाद और सामाजिक समरसता।


सम्मान और अलंकरणों की विराट श्रृंखला

डॉ. सागर त्रिपाठी को भारत एवं विदेशों की अनेक साहित्यिक, सांस्कृतिक और सामाजिक संस्थाओं द्वारा सम्मानित किया गया है।

उपलब्ध विवरण के अनुसार उन्हें अब तक 1,750 से अधिक सम्मान, प्रमाणपत्र, प्रशस्ति-पत्र, मानपत्र, अलंकरण, मानद उपाधियाँ और सहभागिता प्रमाणपत्र प्राप्त हो चुके हैं।

उनके प्रमुख सम्मानों में—

पचास वर्षीय हिन्दी-उर्दू साहित्य लेखन हेतु लाइफ़ टाइम अचीवमेंट सम्मान

टाटा ग्रुप द्वारा पाँच बार सम्मान

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से जुड़ा अमीर ख़ुसरो सम्मान

साहित्य गौरव — बी.एच.यू.

बुंदेलखंड विश्वविद्यालय साहित्य सम्मान

साहित्य रत्न

साहित्य शिरोमणि

साहित्य सारस्वत

साहित्य विभूषण

साहित्य गौरव सम्मान

साहित्य संवर्धन सम्मान

साहित्य पुरोधा सम्मान

प्रतीक्षा मेमोरियल सम्मान

ब्राह्मण भूषण सम्मान

हिन्दी-उर्दू संयुक्त सेवा सम्मान

उर्दू अंजुमन, बर्लिन — जर्मनी सम्मान

प्रोफेट फॉर ऑल ऐज़ाज़

कादम्बरी सम्मान — पाँच बार

हिन्दी सेवा संस्थान सम्मान — दो बार

प्रतिभा संवर्धन सम्मान

हिन्दी साहित्य अकादमी सम्मान

हरे रामा हरे कृष्ण सम्मान

काव्य शिखर सम्मान

काव्य शिरोमणि सम्मान

साहित्य श्री सम्मान

यू.जी.सी. सम्मान — तीन बार

उत्तर प्रदेश से 35 से अधिक सम्मान

शहंशाह-ए-अदब

मीर अवार्ड

ग़ालिब अवार्ड

बशर अवार्ड

दैनिक जागरण सम्मान

झाँसी महोत्सव सम्मान — पाँच बार

कश्फ़ी झाँसवी सम्मान

गुलशन-ए-अदब सम्मान

शायर-ए-वतन सम्मान

मोहसिन-ए-अदब सम्मान

शैदाई-ए-उर्दू सम्मान

कोहिनूर-ए-अदब सम्मान

आबरू-ए-अदब सम्मान

फ़िराक़ गोरखपुरी सम्मान

कालिका प्रसाद ‘बशर’ सम्मान

आई.पी.सी. महामानव सम्मान

साहित्य वैभव सम्मान

हरिवंश राय बच्चन सम्मान

सुमित्रानंदन पंत सम्मान

प्रसार भारती प्रेरणा

वाग्धारा साहित्य सम्मान

तथा मॉरीशस सहित विभिन्न भारतीय और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के अनेक सम्मान शामिल हैं।


विनम्रता — उपलब्धियों से बड़ा गुण

डॉ. सागर त्रिपाठी के व्यक्तित्व की सबसे खूबसूरत बात शायद यह नहीं है कि उन्होंने कितनी पुस्तकें लिखीं, कितने देशों की यात्रा की या कितने सम्मान प्राप्त किए।

उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इतनी उपलब्धियों के बावजूद उनके भीतर विद्यार्थी बने रहने का भाव जीवित है।

वे अपने ज्ञान को अंतिम नहीं मानते।

उनका विश्वास है कि—

“मनुष्य जितना सीखता जाता है, उसे उतना ही एहसास होता है कि अभी कितना कुछ सीखना बाकी है।”

यही दृष्टिकोण उनकी निरंतर रचनात्मक सक्रियता का आधार रहा है।


व्यक्तिगत रुचियाँ

साहित्यिक जीवन के साथ-साथ डॉ. सागर त्रिपाठी का व्यक्तित्व अत्यंत आत्मीय और जीवन्त है।

उनकी प्रमुख रुचियों में—

सृजन और लेखन
गहन अध्ययन
साहित्य के गुण-दोषों पर गंभीर चर्चा
बैडमिंटन
यात्रा और भ्रमण

विशेष रूप से शामिल हैं।

उनकी मेहमाननवाज़ी उनके व्यक्तित्व की एक अलग पहचान है।

उन्हें अतिथियों का आत्मीय स्वागत करना अत्यंत प्रिय है और विशेष प्रकार के स्वादिष्ट व्यंजन स्वयं तैयार करना भी उनके प्रिय शौकों में शामिल है।


एक साहित्यकार से बढ़कर एक सेतु

डॉ. पण्डित सागर त्रिपाठी को केवल हिन्दी कवि कहना उनके व्यक्तित्व को सीमित कर देना होगा।

वे हिन्दी और उर्दू के बीच एक साहित्यिक सेतु हैं।

वे परम्परा और आधुनिकता के बीच एक संवाद हैं।

वे धार्मिक पहचान और सार्वभौमिक मानवता के बीच एक संतुलन हैं।

वे व्यवसाय और साहित्य, संगठन और सृजन, अनुभव और विद्यार्थी भाव—इन सभी को एक साथ जीने वाले व्यक्तित्व हैं।

उनकी यात्रा हमें यह संदेश देती है कि—

मनुष्य की वास्तविक महानता इस बात में नहीं है कि उसने कितने सम्मान प्राप्त किए, बल्कि इस बात में है कि इतने सम्मान पाने के बाद भी उसके भीतर सीखने की विनम्रता कितनी बची रही।


साहित्य के सागर — सागर त्रिपाठी

उनका नाम “सागर” है और उनके साहित्यिक जीवन को देखकर यह नाम अपने आप में अर्थपूर्ण प्रतीत होता है।

जैसे सागर में असंख्य लहरें होती हैं, वैसे ही उनके साहित्यिक संसार में ग़ज़ल, गीत, दोहे, हाइकू, नज़्में, नात, हम्द, मर्सिया और कविताओं की असंख्य लहरें मौजूद हैं।

कुछ लहरें प्रेम की हैं।

कुछ अध्यात्म की।

कुछ समाज की पीड़ा की।

कुछ मानवता की पुकार की।

और कुछ उस साझा संस्कृति की, जिसमें हिन्दी और उर्दू एक-दूसरे से अलग नहीं बल्कि एक-दूसरे को समृद्ध करती हैं।


विरासत

लगभग आधी सदी से अधिक की साहित्यिक साधना, हजारों साहित्यिक आयोजनों में सहभागिता, विश्व के अनेक देशों में काव्य पाठ, अनेक पुस्तकों की रचना और हजारों-हजार छंदों व अशआर का सृजन—

यह सब मिलकर डॉ. सागर त्रिपाठी के जीवन को एक व्यापक साहित्यिक विरासत में परिवर्तित करते हैं।

यह विरासत केवल उनके नाम से प्रकाशित पुस्तकों की नहीं है।

यह उन साहित्यिक मंचों की भी विरासत है जिन्हें उन्होंने सजाया।

उन नवोदित रचनाकारों की भी है जिन्हें उन्होंने प्रोत्साहित किया।

उन पाठकों की भी है जिन्होंने उनकी पंक्तियों में स्वयं को खोजा।

और उन सभी लोगों की है जिन्होंने उनके माध्यम से हिन्दी, उर्दू, भारतीय संस्कृति और इंसानी मोहब्बत के बीच एक सुंदर रिश्ता महसूस किया।


निष्कर्ष

डॉ. पण्डित सागर त्रिपाठी का जीवन एक ऐसे व्यक्ति की कहानी है जिसने ज्ञान को मंज़िल नहीं, यात्रा माना; साहित्य को पेशा नहीं, साधना माना; पद को प्रतिष्ठा नहीं, जिम्मेदारी माना और धर्म-संस्कृति को विभाजन नहीं, संवाद का माध्यम माना।

व्यवसाय के क्षेत्र में नेतृत्व, सामाजिक संस्थाओं में जिम्मेदारी, विश्व स्तर पर साहित्यिक सहभागिता और हजारों रचनाओं का सृजन—इन सबके बीच उनके व्यक्तित्व का सबसे सुंदर परिचय वही है जिसे वे स्वयं स्वीकार करते हैं—

“मैं आज भी एक विद्यार्थी हूँ।”

शायद यही एक पंक्ति उनके पूरे व्यक्तित्व का सार है।

**सम्मान उन्हें मिले हजारों,

मगर उन्होंने ज्ञान के सामने सिर झुकाए रखा।

दुनिया ने उन्हें साहित्यकार, अध्यक्ष और विद्वान कहा,

और वे स्वयं को आज भी विद्यार्थी बताते रहे।**

यही विनम्रता डॉ. सागर त्रिपाठी को केवल एक साहित्यकार नहीं, बल्कि एक संस्था, एक विचार और एक जीवंत साहित्यिक परम्परा बनाती है।


व्यक्तिगत विवरण

नाम: डॉ. पण्डित सागर त्रिपाठी
जन्मस्थान: सुल्तानपुर, उत्तर प्रदेश
आयु: 76 वर्ष
वर्तमान निवास: मुंबई, महाराष्ट्र, भारत

प्रमुख पद

चेयरमैन: पृथ्वी ग्रुप ऑफ कम्पनीज़
विश्व अध्यक्ष: विश्व ब्राह्मण परिषद
वाइस चेयरमैन: वर्ल्ड सूफ़ी काउन्सिल
फाउंडर पेट्रन: आई.पी.सी.
राष्ट्रीय प्रवक्ता: राष्ट्रीय अम्न महासंघ

सम्पर्क

मोबाइल: +91 9920052915
मोबाइल: +91 9820052915

पता:
1/25, न्यू पुष्प विहार,
कोलाबा पोस्ट ऑफिस के सामने,
कोलाबा, मुंबई – 400005,
महाराष्ट्र, भारत

ईमेल: sagartripathi@hotmail.com
ईमेल: sagartripathi7643@gmail.com

वेबसाइट: www.sagartripathi.com


विशेष पंक्ति

“साहित्य जिनकी साधना है, ज्ञान जिनकी निरंतर यात्रा है, सौहार्द जिनका संदेश है और विनम्रता जिनकी पहचान—वे हैं डॉ. पण्डित सागर त्रिपाठी।”

 

 

ڈاکٹر پنڈت ساگر ترپاٹھی

ادب، علم، روحانیت، انسانیت اور عالمی ہم آہنگی کا ایک عظیم نام

“جس شخصیت نے نصف صدی سے زیادہ عرصہ لفظوں کی عبادت میں گزار دیا ہو، ہزاروں تخلیقات ادب کے نام کی ہوں اور دنیا کے بے شمار ممالک میں ہندی و اُردو کی مشترکہ تہذیب کی خوشبو پھیلائی ہو، اس کا تعارف صرف عہدوں اور اعزازات سے نہیں بلکہ اس کی علمی و ادبی ریاضت سے ہوتا ہے۔”

ڈاکٹر پنڈت ساگر ترپاٹھی ہندوستان کے اُن ہمہ جہت اور ممتاز ادبی و سماجی شخصیات میں شمار ہوتے ہیں جن کی زندگی میں ادب، علم، روحانیت، سماجی ہم آہنگی، عالمی اخوت، مطالعہ، تنظیمی قیادت اور انسانی اقدار ایک دوسرے سے جڑی ہوئی نظر آتی ہیں۔

اتر پردیش کے سلطان پور میں پیدا ہونے والے ڈاکٹر ساگر ترپاٹھی آج پرتھوی گروپ آف کمپنیز کے چیئرمین، وشو براہمن پریشد کے عالمی صدر، ورلڈ صوفی کاؤنسل کے وائس چیئرمین، آئی پی سی کے فاؤنڈر پیٹرن اور راشٹریہ امن مہا سنگھ کے قومی ترجمان کی حیثیت سے مختلف سماجی، ثقافتی اور تنظیمی ذمہ داریاں نبھا رہے ہیں۔

لیکن ان تمام عہدوں اور اعزازات سے کہیں بڑھ کر ان کی اصل پہچان اُس شخص کی ہے جس نے اپنی پوری زندگی کا بڑا حصہ پڑھنے، لکھنے، سیکھنے، سوچنے اور ادب کے ذریعے انسانوں کو انسانوں سے جوڑنے کے لیے وقف کر دیا۔


ابتدائی زندگی اور شخصیت

ڈاکٹر پنڈت ساگر ترپاٹھی کی جائے پیدائش سلطان پور، اتر پردیش ہے۔

آج 76 برس کی عمر میں بھی ان کی علمی جستجو، ادبی سرگرمی اور نئی چیزیں سیکھنے کی خواہش ایک نوجوان طالب علم جیسی دکھائی دیتی ہے۔

ان کی شخصیت کی سب سے نمایاں خصوصیت ان کی غیر معمولی انکساری ہے۔

دہائیوں کے مطالعے، بے شمار ادبی تخلیقات، ہزاروں مشاعروں اور عالمی ادبی پروگراموں میں شرکت اور متعدد اعزازات کے باوجود وہ آج بھی خود کو فخر سے نہیں بلکہ عاجزی سے—

“بنیادی طور پر آج بھی ایک طالب علم”

کہتے ہیں۔

یہی طرزِ فکر ان کی شخصیت کو ان کی کامیابیوں سے بھی زیادہ بلند بناتا ہے۔


علم کے ساتھ عمر بھر کا رشتہ

ڈاکٹر ساگر ترپاٹھی کے نزدیک سیکھنے کا سفر کبھی ختم نہیں ہوتا۔

انہوں نے تقریباً پانچ دہائیوں تک مسلسل مطالعہ، تحریر، تحقیق اور فکری ریاضت کو اپنی زندگی کا حصہ بنائے رکھا۔

ان کی تعلیمی اور علمی وابستگی میں خصوصاً—

پریاگ وشو ودھیالیہ / الہ آباد یونیورسٹی
کے۔ سی۔ لا کالج
ڈیٹا میٹکس مینجمنٹ
ٹریول ریسرچ اینڈ مینجمنٹ
تکنیکی اور انتظامی تعلیم
مینجمنٹ
فنونِ لطیفہ
نفسیاتی تجزیہ اور تحقیق

جیسے کئی شعبے شامل رہے۔

اس کے علاوہ انہیں ملک اور بیرونِ ملک سے مختلف تعلیمی، قانونی، تکنیکی، انتظامی، سفری، ڈپلومہ، اسناد، اعزازی ڈگریاں اور اعزازی خطابات بھی حاصل ہوئے۔

لیکن اتنا طویل علمی سفر طے کرنے کے بعد بھی وہ خود کو یہی کہتے ہیں—

“علم کے سمندر میں آج بھی ایک طالب علم ہوں۔”


نصف صدی سے زیادہ کی ادبی ریاضت

ڈاکٹر پنڈت ساگر ترپاٹھی کا ادبی سفر تقریباً پانچ دہائیوں سے زیادہ کی مسلسل تخلیقی ریاضت کا نتیجہ ہے۔

ہندی اور اُردو دونوں زبانوں پر ان کی گہری گرفت نے انہیں ادب کی مختلف اصناف میں اظہار کا وسیع موقع دیا۔

انہوں نے—

غزل، نظم، دوہا، ہائیکو، گیت، چھند، مکتک، حمد، نعت، مناجات، سلام، منقبت، مرثیہ، رباعیات اور قطعات

سمیت متعدد ادبی اصناف میں وسیع پیمانے پر تخلیق کی ہے۔

ان کی تحریروں میں کبھی روحانیت کی گہرائی دکھائی دیتی ہے، کبھی انسانی رشتوں کی نرمی، کبھی معاشرتی حقیقتوں کی تلخی اور کبھی محبت، بھائی چارے اور انسانیت کا پیغام۔

ان کے لیے ادب محض الفاظ کی آرائش نہیں بلکہ—

انسان کو انسان سے جوڑنے کا ایک ذریعہ ہے۔


اہم ہندی تصانیف

ڈاکٹر ساگر ترپاٹھی کی نمایاں ہندی تصانیف میں—

کبندھ
شبدھ ویدھ — تین زبانوں میں
چھتج / کشتیج
شر سندھان
پرتیدھونی
ساگر ست سئی — دوہا مجموعہ
ساگر سپت شتی — دوہا مجموعہ
شنکھ ناد — زیرِ اشاعت

جیسی تصانیف شامل ہیں۔

ان کتابوں میں ان کے طویل مطالعے، تجربے، زبان کی گہرائی اور فکری وسعت کی جھلک واضح نظر آتی ہے۔


اُردو اور غزل کی دنیا میں نمایاں مقام

ہندی ادب کے ساتھ ساتھ ڈاکٹر ساگر ترپاٹھی نے اُردو اور خصوصاً غزل کی دنیا میں بھی نمایاں خدمات انجام دی ہیں۔

ان کے اہم غزلیہ اور ادبی مجموعوں میں—

ساگر کی لہریں
رچنا اور رچناکار
غزل سپتک
کہکشاں
کرچیاں
اُفق
الف
جزیرہ
ماں — دوسرا ایڈیشن
سائبانِ رحمت — نعتیہ مجموعہ

شامل ہیں۔

دستیاب معلومات کے مطابق ان کی ادبی و تخلیقی کتابوں کی مجموعی تعداد تقریباً 23 تک پہنچ چکی ہے۔


تخلیقات کا ایک وسیع سمندر

ڈاکٹر پنڈت ساگر ترپاٹھی کی ادبی دنیا صرف کتابوں تک محدود نہیں۔

ان کے تخلیقی سرمائے کے دستیاب اعداد و شمار ان کی غیر معمولی ادبی محنت کی ایک جھلک پیش کرتے ہیں۔

ان کی تخلیقات میں—

87,000 سے زائد اشعار

17,000 سے زائد غزلیں

کے علاوہ بڑی تعداد میں—

حمد
نعت
مناجات
سلام
منقبت
مرثیہ
رباعیات
نظمیں
قطعات

شامل ہیں۔

مزید یہ کہ انہوں نے تقریباً—

5,000 دوہے
3,500 ہائیکو
5,000 چھند، مکتک اور قطعات
3,500 گیت اور نظمیں
اور
1,500 سے زائد آزاد تخلیقات

تحریر کی ہیں۔

یہ محض اعداد نہیں بلکہ اُن بے شمار راتوں، مشاہدات، تجربات اور جذبوں کی نمائندگی کرتے ہیں جنہیں انہوں نے لفظوں میں ڈھالا۔

وزیراعظم نریندر مودی کی زبان سے ڈاکٹر ساگر ترپاٹھی کا شعر

ڈاکٹر پنڈت ساگر ترپاٹھی کی ادبی زندگی کا ایک نہایت یادگار اور قابلِ فخر باب اُس وقت رقم ہوا، جب ان کا مشہور شعر ہندوستان کے وزیراعظم نریندر مودی کی زبان سے ملک کے سب سے اہم قومی اور پارلیمانی پلیٹ فارم پر سنائی دیا۔

ان کا معروف شعر ہے:

**“جب حوصلہ بنا لیا اونچی اُڑان کا،

پھر دیکھنا فضول ہے قد آسمان کا۔”**

یہ شعر محض ایک شعری مصرع نہیں رہا، بلکہ وقت کے ساتھ حوصلے، عزم، خود اعتمادی اور بلند پروازی کا ایک مقبول پیغام بن گیا۔


پارلیمنٹ میں شعر کا ذکر — 25 جون 2019

25 جون 2019 کو وزیراعظم نریندر مودی نے پارلیمنٹ میں اپنے خطاب کے دوران ڈاکٹر ساگر ترپاٹھی کا یہی معروف شعر پیش کیا۔

اس موقع پر وزیراعظم نے ملک کی تعمیر، بلند عزائم اور مضبوط ارادے کا پیغام دیتے ہوئے کہا:

**“جب حوصلہ بنا لیا اونچی اُڑان کا،

پھر دیکھنا فضول ہے قد آسمان کا۔”**

ملک کے وزیراعظم کی جانب سے پارلیمنٹ کے ایوان میں کسی شاعر کے کلام کا حوالہ دیا جانا بذاتِ خود ایک بڑی ادبی پہچان ہے۔

اس لمحے نے ڈاکٹر ساگر ترپاٹھی کے اس شعر کو ایک وسیع قومی سطح پر نئی شناخت عطا کی۔


دینک جاگرن میں خصوصی ذکر

اس واقعے کو معروف ہندی روزنامہ دینک جاگرن نے بھی نمایاں طور پر شائع کیا۔

اخباری رپورٹ میں اس شعر اور اس کے خالق ساگر ترپاٹھی کا خصوصی ذکر کیا گیا اور یہ بتایا گیا کہ یہی شعر وزیراعظم نریندر مودی نے پارلیمنٹ میں اپنے خطاب کے دوران پیش کیا۔

اس واقعے نے اس شعر کی ادبی مقبولیت کو مزید وسعت دی۔


جھانسی کے آل انڈیا مشاعرے سے پارلیمنٹ تک

دستیاب اخباری مواد کے مطابق ڈاکٹر ساگر ترپاٹھی نے یہ شعر پہلی مرتبہ دینک جاگرن کے زیرِ اہتمام جھانسی میں منعقد ہونے والے ایک آل انڈیا مشاعرے میں پڑھا تھا۔

وہاں سے شروع ہونے والا اس شعر کا سفر رفتہ رفتہ ادبی حلقوں، مشاعروں، کوی سمیلنوں اور مختلف پروگراموں تک پہنچا۔

بعد ازاں اس شعر کو ڈاکٹر ساگر ترپاٹھی کے معروف غزلیہ مجموعے—

“ساگر کی لہریں”

میں بھی شامل کیا گیا۔

وقت کے ساتھ یہ شعر ان کی ادبی شناخت سے اس قدر وابستہ ہوگیا کہ مختلف مشاعروں اور تقریبات میں سامعین کی جانب سے اس غزل کو سنانے کی فرمائش کی جانے لگی۔


ٹیلی ویژن اور قومی میڈیا پر گونج

وزیراعظم کے ذریعے اس شعر کو پیش کیے جانے کے مناظر قومی ٹیلی ویژن اور نیوز میڈیا پر بھی نشر ہوئے۔

لوک سبھا کی کارروائی اور India TV سمیت مختلف نشریاتی پلیٹ فارمز پر وزیراعظم کے خطاب کے دوران یہ شعر نمایاں طور پر دکھائی اور سنائی دیا۔

یوں ایک شاعر کی تخلیق مشاعرے کے اسٹیج سے نکل کر ملک کی پارلیمنٹ اور قومی ٹیلی ویژن تک پہنچی۔

یہ ڈاکٹر ساگر ترپاٹھی کے ادبی سفر کے اہم ترین لمحات میں شمار کیا جاسکتا ہے۔


انڈیا–امریکہ آئیڈیاز سمٹ میں دوبارہ ذکر

ڈاکٹر ساگر ترپاٹھی کی جانب سے فراہم کردہ تفصیلات کے مطابق 22 جولائی کو منعقد ہونے والی انڈیا–امریکہ آئیڈیاز میٹ/سمٹ میں بھی وزیراعظم نریندر مودی کی جانب سے ان کے اسی معروف شعر کا حوالہ دیا گیا۔

ان کے ذاتی بیان کے مطابق ایک سال کے عرصے میں وزیراعظم کی جانب سے ان کے شعر کا متعدد مرتبہ ذکر ہونا ان کے لیے غیر معمولی اعزاز اور خوشی کا باعث بنا۔

یہی وجہ ہے کہ یہ شعر آج ان کی ادبی شناخت کا ایک نمایاں حصہ بن چکا ہے۔


ایک شعر جو حوصلے کی علامت بن گیا

ڈاکٹر ساگر ترپاٹھی کے ہزاروں اشعار میں یہ شعر ایک خاص مقام رکھتا ہے:

**“جب حوصلہ بنا لیا اونچی اُڑان کا،

پھر دیکھنا فضول ہے قد آسمان کا۔”**

اس شعر کی اصل طاقت اس کی سادگی اور آفاقی پیغام میں ہے۔

یہ انسان کو یاد دلاتا ہے کہ جب ارادہ مضبوط ہو اور منزل بلند ہو، تو راستے کی رکاوٹوں اور اپنی محدود حیثیت کو دیکھنے کے بجائے آگے بڑھنا چاہیے۔

یہی وجہ ہے کہ یہ شعر صرف ادبی حلقوں تک محدود نہیں رہا بلکہ عزم اور کامیابی کے ایک ترغیبی پیغام کی صورت اختیار کر گیا۔


ادبی زندگی کا تاریخی لمحہ

کسی شاعر کے لیے اس سے زیادہ جذباتی لمحہ شاید ہی ہو کہ اس کے لکھے ہوئے الفاظ ملک کے وزیراعظم کی زبان سے پارلیمنٹ میں گونجیں۔

ڈاکٹر ساگر ترپاٹھی کے لیے یہ اعزاز محض ذاتی کامیابی نہیں بلکہ ان کی کئی دہائیوں کی ادبی ریاضت کی ایک اہم عوامی پہچان بھی ہے۔

**جس شعر نے کبھی ایک مشاعرے میں داد حاصل کی،

وہی شعر ایک دن ہندوستان کی پارلیمنٹ میں گونج اٹھا۔**

**قلم نے جو سوچ کاغذ پر لکھی تھی،

وقت نے اسے قومی آواز بنا دیا۔**

اور شاید اسی سفر کو سب سے خوبصورت انداز میں خود انہی کے الفاظ بیان کرتے ہیں:

**“جب حوصلہ بنا لیا اونچی اُڑان کا،

پھر دیکھنا فضول ہے قد آسمان کا۔”**

— ڈاکٹر پنڈت ساگر ترپاٹھی


عالمی سطح پر ہندی اور اُردو کی نمائندگی

ڈاکٹر ساگر ترپاٹھی کی ادبی سرگرمیاں ہندوستان کی سرحدوں تک محدود نہیں رہیں۔

انہوں نے دنیا کے متعدد ممالک میں ہونے والے—

مشاعروں، کوی سمیلنوں، ادبی نشستوں، سیمیناروں، ثقافتی تقریبات اور ادبی کانفرنسوں

میں شرکت کی۔

دستیاب معلومات کے مطابق انہیں تقریباً 44 ممالک میں ادبی و ثقافتی تقریبات میں شرکت کا اعزاز حاصل ہوا۔

ان کے اہم بین الاقوامی سفر میں—

امریکہ، کینیڈا، انگلینڈ، اسکاٹ لینڈ، فرانس، سوئٹزرلینڈ، ناروے، اسپین، اٹلی، جرمنی، پرتگال، سویڈن، آسٹریا، ہالینڈ، نیپال، سنگاپور، فجی، تھائی لینڈ، ہانگ کانگ، جاپان، ملیشیا، انڈونیشیا، سعودی عرب، قطر، مسقط، متحدہ عرب امارات، دبئی، بحرین، مصر، اردن، ترکی، یونان، ماریشس، صلالہ، مالے اور سری لنکا

سمیت متعدد ممالک شامل ہیں۔

ان بین الاقوامی ادبی دوروں نے انہیں محض ایک شاعر نہیں بلکہ ہندوستانی تہذیب، ہندی-اُردو زبان اور مشترکہ انسانی ثقافت کے نمائندہ کے طور پر بھی متعارف کرایا۔


ہزاروں عالمی ادبی تقریبات میں شرکت

ڈاکٹر ساگر ترپاٹھی کی عوامی و ادبی سرگرمیاں نہایت وسیع رہی ہیں۔

دستیاب معلومات کے مطابق انہوں نے دنیا بھر میں 3,700 سے زائد مشاعروں، کوی سمیلنوں، نشستوں، سیمیناروں اور ادبی اجتماعات میں شرکت کی۔

ان پروگراموں میں انہوں نے صرف کلام پیش نہیں کیا بلکہ متعدد مواقع پر—

کنوینر
منتظم
سرپرست
ناظمِ مشاعرہ
اسٹیج کنڈکٹر
ادیب اور شاعر

کی حیثیت سے بھی کردار ادا کیا۔

اس کے علاوہ تقریباً—

200 کتابوں کا رسمِ اجرا

اور

1,000 سے زائد ادبی نشستوں، ورکشاپس اور محافل

کے انعقاد، تنظیم اور فروغ میں بھی ان کی فعال شرکت رہی ہے۔


مذہبی ہم آہنگی اور انسانیت کا پیغام

ڈاکٹر ساگر ترپاٹھی کی شخصیت کا ایک نہایت اہم پہلو بین المذاہب احترام اور انسانی ہم آہنگی ہے۔

ایک طرف وہ طویل عرصے سے وشو براہمن پریشد کے عالمی صدر کے طور پر وابستہ ہیں تو دوسری طرف ورلڈ صوفی کاؤنسل کے وائس چیئرمین کے عہدے پر بھی خدمات انجام دے رہے ہیں۔

یہ ان کی فکری وسعت کا ایک خوبصورت اظہار ہے۔

ان کا طرزِ فکر یہ پیغام دیتا ہے کہ—

اپنی روایت سے محبت اور دوسرے مذاہب، زبانوں اور تہذیبوں کا احترام ایک دوسرے کی مخالفت نہیں بلکہ ہندوستانی ثقافت کی اصل طاقت ہے۔

حمد، نعت، سلام، منقبت اور مرثیہ کی مقدس محافل میں ان کی مسلسل شرکت بھی ان کے اسی وسیع النظری اور انسان دوست مزاج کی علامت ہے۔


وشو براہمن پریشد سے پانچ دہائیوں کی وابستگی

ڈاکٹر پنڈت ساگر ترپاٹھی تقریباً 50 برس سے وشو براہمن پریشد سے وابستہ ہیں اور دستیاب تعارف کے مطابق 1976 سے مسلسل عالمی صدر کی ذمہ داری نبھا رہے ہیں۔

اتنے طویل عرصے تک کسی ادارے اور نظریے کے ساتھ مسلسل کام کرنا اُن کی تنظیمی استقامت اور وابستگی کی مضبوط مثال ہے۔

ان کی تنظیمی سوچ میں—

سماجی ہم آہنگی، ثقافتی تحفظ، مکالمہ اور عالمی بھائی چارہ

اہم حیثیت رکھتے ہیں۔


کاروباری اور انتظامی زندگی

ادب اور سماجی خدمات کے ساتھ ڈاکٹر ساگر ترپاٹھی کاروبار اور انتظامی میدان میں بھی سرگرم رہے ہیں۔

وہ—

پرتھوی گروپ آف کمپنیز کے چیئرمین

ہیں۔

کاروباری ذمہ داریوں کے باوجود ادب، سماجی سرگرمیوں اور عالمی ادبی تقریبات میں دہائیوں تک مسلسل فعال رہنا ان کی ہمہ جہت شخصیت کو ظاہر کرتا ہے۔


اہم عہدے اور ذمہ داریاں

ڈاکٹر پنڈت ساگر ترپاٹھی مختلف اداروں میں اہم ذمہ داریاں نبھا چکے ہیں یا نبھا رہے ہیں۔

چیئرمین — پرتھوی گروپ آف کمپنیز

عالمی صدر — وشو براہمن پریشد

وائس چیئرمین — ورلڈ صوفی کاؤنسل

فاؤنڈر پیٹرن — آئی پی سی

قومی ترجمان — راشٹریہ امن مہا سنگھ

ان تمام ذمہ داریوں میں ان کی شخصیت کے تین اہم پہلو نمایاں ہیں—

قیادت، مکالمہ اور ہم آہنگی۔


1750 سے زائد اعزازات اور اسناد

ڈاکٹر ساگر ترپاٹھی کو بھارت اور بیرونِ ملک متعدد ادبی، ثقافتی اور سماجی اداروں کی جانب سے اعزازات سے نوازا گیا ہے۔

دستیاب تفصیلات کے مطابق انہیں 1750 سے زائد اسناد، اعزازات، یادگاری شیلڈز، توصیفی اسناد، اعزازی خطابات، ٹرافیاں اور شرکت کے سرٹیفکیٹس حاصل ہو چکے ہیں۔

ان کے چند نمایاں اعزازات میں—

پچاس سالہ ہندی-اُردو ادبی خدمات پر لائف ٹائم اچیومنٹ اعزاز

ٹاٹا گروپ کی جانب سے پانچ مرتبہ اعزاز

علی گڑھ مسلم یونیورسٹی سے منسوب امیر خسرو اعزاز

ساہتیہ گورو — بی ایچ یو

بندیل کھنڈ یونیورسٹی ادبی اعزاز

ساہتیہ رتن

ساہتیہ شرومنی

ساہتیہ سارسوت

ساہتیہ وبھوشن

ساہتیہ گورو سمان

ساہتیہ سنوردھن سمان

ساہتیہ پروڈھا سمان

پرتیکشا میموریل سمان

براہمن بھوشن سمان

ہندی-اُردو مشترکہ خدمت اعزاز

اُردو انجمن برلن، جرمنی اعزاز

پروفیٹ فار آل اعزاز

کادمبری سمان — پانچ مرتبہ

ہندی سیوا سنستھان — دو مرتبہ

پرتبھا سنوردھن سمان

ہندی ساہتیہ اکادمی اعزاز

ہرے رام ہرے کرشنا سمان

کاویہ شکھر سمان

کاویہ شرومنی سمان

ساہتیہ شری سمان

یو جی سی سمان — تین مرتبہ

اتر پردیش سے 35 سے زائد اعزازات

شہنشاہِ ادب

میر ایوارڈ

غالب ایوارڈ

بشر ایوارڈ

روزنامہ جاگرن اعزاز

جھانسی مہوتسو اعزاز — پانچ مرتبہ

کشفی جھانسوی سمان

گلشنِ ادب سمان

شاعرِ وطن سمان

محسنِ ادب سمان

شیدائیِ اُردو سمان

کوہ نورِ ادب سمان

آبروئے ادب سمان

فراق گورکھپوری سمان

کالیکا پرساد بشر سمان

آئی پی سی مہامانو سمان

ساہتیہ ویبھو سمان

ہری ونش رائے بچن سمان

سمترا نندن پنت سمان

پرسار بھارتی پریرنا

واگ دھارا ساہتیہ سمان

اور ماریشس سمیت مختلف قومی و بین الاقوامی اداروں کے اعزازات شامل ہیں۔


انکساری — سب سے بڑا اعزاز

ڈاکٹر ساگر ترپاٹھی کی شخصیت کا سب سے خوبصورت پہلو شاید یہ نہیں کہ انہیں کتنے انعامات اور اعزازات ملے۔

اصل عظمت یہ ہے کہ اتنی کامیابیوں کے باوجود ان کے اندر طالب علم والی جستجو اور عاجزی آج بھی زندہ ہے۔

ان کا طرزِ فکر ہمیں یہ سکھاتا ہے کہ—

“انسان جتنا زیادہ سیکھتا ہے، اتنا ہی اسے احساس ہوتا ہے کہ ابھی سیکھنے کے لیے بہت کچھ باقی ہے۔”

یہی احساس ان کی طویل تخلیقی اور فکری زندگی کی بنیاد ہے۔


ذاتی دلچسپیاں

ادب کے علاوہ ڈاکٹر ساگر ترپاٹھی کو—

مطالعہ
تخلیق و تالیف
شعر و ادب پر سنجیدہ گفتگو
بیڈمنٹن
سیر و سیاحت

سے خصوصی دلچسپی ہے۔

ان کی شخصیت کا ایک خوبصورت پہلو ان کی مہمان نوازی بھی ہے۔

مہمانوں کا دل سے استقبال کرنا اور مختلف اقسام کے مزیدار کھانے تیار کرنا ان کے پسندیدہ مشاغل میں شامل ہے۔


صرف ادیب نہیں، ایک تہذیبی پل

ڈاکٹر پنڈت ساگر ترپاٹھی کو صرف ایک شاعر یا ادیب کہنا شاید ان کے وسیع کردار کو محدود کرنا ہوگا۔

وہ ہندی اور اُردو کے درمیان ایک ادبی پل ہیں۔

وہ روایت اور جدید فکر کے درمیان ایک مکالمہ ہیں۔

وہ مذہبی شناخت اور عالمگیر انسانیت کے درمیان ایک توازن ہیں۔

وہ کاروبار، ادب، سماج، روحانیت اور تنظیمی زندگی کو ایک ساتھ جینے والی شخصیت ہیں۔

ان کی زندگی ہمیں یہ پیغام دیتی ہے کہ—

انسان کی اصل عظمت اس میں نہیں کہ اسے کتنے اعزازات ملے، بلکہ اس میں ہے کہ اتنے اعزازات کے بعد بھی اس کے اندر سیکھنے کی خواہش اور عاجزی کتنی باقی رہی۔


ادب کا ساگر — ساگر ترپاٹھی

ان کا نام “ساگر” ہے اور ان کی ادبی زندگی کو دیکھ کر یہ نام خود بخود بامعنی محسوس ہوتا ہے۔

جس طرح سمندر میں بے شمار لہریں ہوتی ہیں، ویسے ہی ان کے ادبی سفر میں—

غزل، نظم، دوہا، ہائیکو، گیت، نعت، حمد، سلام، منقبت، مرثیہ اور شاعری

کی بے شمار لہریں موجود ہیں۔

کچھ لہریں محبت کی ہیں۔

کچھ روحانیت کی۔

کچھ معاشرے کے دکھ کی۔

کچھ انسانیت کی۔

اور کچھ اُس مشترکہ تہذیب کی جن میں ہندی اور اُردو ایک دوسرے کی حریف نہیں بلکہ ایک دوسرے کی خوبصورتی میں اضافہ کرتی ہیں۔


ادبی وراثت

نصف صدی سے زیادہ کی ادبی ریاضت، ہزاروں عالمی تقریبات میں شرکت، متعدد ممالک میں کلام پیش کرنا، درجنوں کتابوں کی تصنیف اور ہزاروں اشعار و تخلیقات—

یہ سب مل کر ڈاکٹر ساگر ترپاٹھی کی زندگی کو ایک وسیع ادبی وراثت میں تبدیل کرتے ہیں۔

یہ وراثت صرف کتابوں تک محدود نہیں۔

یہ اُن ادبی محفلوں کی بھی ہے جنہیں انہوں نے سجایا۔

اُن نئے قلم کاروں کی بھی ہے جنہیں انہوں نے حوصلہ دیا۔

اُن قارئین کی بھی ہے جنہوں نے ان کی تحریروں میں اپنے جذبات کو پہچانا۔

اور اُن تمام لوگوں کی بھی ہے جنہوں نے ان کے ذریعے ہندی، اُردو، ہندوستانی تہذیب اور انسانی محبت کو قریب سے محسوس کیا۔


اختتامیہ

ڈاکٹر پنڈت ساگر ترپاٹھی کی زندگی اُس شخصیت کی داستان ہے جس نے علم کو منزل نہیں بلکہ سفر سمجھا، ادب کو پیشہ نہیں بلکہ عبادت مانا، عہدے کو شان نہیں بلکہ ذمہ داری سمجھا، اور مذہب و ثقافت کو تقسیم کا ذریعہ نہیں بلکہ مکالمے کا وسیلہ بنایا۔

کاروباری قیادت، سماجی ذمہ داریاں، عالمی ادبی سرگرمیاں، ہزاروں تخلیقات اور 1750 سے زائد اعزازات کے باوجود ان کی سب سے خوبصورت پہچان یہی ہے—

“میں آج بھی ایک طالب علم ہوں۔”

شاید یہی ایک جملہ ان کی پوری شخصیت کا خلاصہ ہے۔

**اعزاز انہیں ہزاروں ملے،

مگر علم کے سامنے سر ہمیشہ جھکا رہا۔
دنیا نے انہیں شاعر، ادیب، صدر اور دانشور کہا،
اور وہ خود کو آج بھی ایک طالب علم کہتے رہے۔**

یہی عاجزی ڈاکٹر ساگر ترپاٹھی کو صرف ایک ادیب نہیں بلکہ—

ایک ادارہ، ایک فکر اور ایک زندہ ادبی روایت

بناتی ہے۔


ذاتی معلومات

نام: ڈاکٹر پنڈت ساگر ترپاٹھی
جائے پیدائش: سلطان پور، اتر پردیش
عمر: 76 سال
موجودہ قیام: ممبئی، مہاراشٹر، بھارت

اہم عہدے

چیئرمین: پرتھوی گروپ آف کمپنیز
عالمی صدر: وشو براہمن پریشد
وائس چیئرمین: ورلڈ صوفی کاؤنسل
فاؤنڈر پیٹرن: آئی پی سی
قومی ترجمان: راشٹریہ امن مہا سنگھ

رابطہ

موبائل: +91 9920052915
موبائل: +91 9820052915

پتہ:
1/25، نیو پشپ وہار،
کولابا پوسٹ آفس کے سامنے،
کولابا، ممبئی – 400005،
مہاراشٹر، بھارت

ای میل: sagartripathi@hotmail.com
ای میل: sagartripathi7643@gmail.com

ویب سائٹ: www.sagartripathi.com


خصوصی تعارفی سطر

“ادب جن کی عبادت ہے، علم جن کا مسلسل سفر ہے، انسانیت جن کا پیغام ہے اور عاجزی جن کی پہچان — وہ ہیں ڈاکٹر پنڈت ساگر ترپاٹھی۔”

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